मुर्दखाय केदार ने बीईएसए के एक आलेख में लिखा है कि बहुत से लोगों को इस बात पर हैरत है कि आखिर सऊदी अरब क्यों नहीं इस्राईल के साथ संबंध सामान्य बनाने की रेलगाड़ी पर सवार हो रहा है? यह तो सब जानते हैं कि सऊदी अरब ने जब यूएई, बहरैन और सूडान को हरी झंडी दी तब इन देशों ने इस्राईल के साथ संबंध बनाए। सऊदी अरब ने भी अपनी वायु सीमा इस्राईली विमानों के लिए खोल दी जो वास्तव में संबंध सामान्य बनाने की दिशा में एक क़दम है। लेकिन इन सब के बावजूद सऊदी क्राउन प्रिंस और इस्राईली प्रधानमंत्री के मध्य गत 22 नवंबर की बैठक में उम्मीद के अनुसार कोई परिणाम सामने नहीं आया। इसका एक सुबूत यह भी है कि सऊदी अरब ने इस भेंट से ही इन्कार कर दिया।

इस बैठक के बारे में विश्व स्तर पर मीडिया में जो कहा गया उससे सऊदी अरब की बहुत बेइज़्ज़ती हुई और यह इस्राईल के लिए अच्छा नहीं है। जहां तक यह सवाल है कि सऊदी अरब को असमंजस क्यों है ? तो इसके जवाब के बारे में अमरीका की नयी सरकार को सोचना चाहिए। अमरीकी नीतियों में जल्द ही होने वाला बदलाव और इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने में सऊदी अरब की अरुचि, ईरान के खिलाफ इलाक़े में एक मोर्चा बनाने के लिए यूएई, बहरैन, सूडान और इस्राईल के प्रयासों को झटका लगा सकती है।
इस्राईल के संबंध बनाने को लेकर सऊदी अरब के असंमजस की कई वजहें हो सकती हैं लेकिन सब से बड़ी वजह, ईरान से डर और सऊदी अरब व इस्राईल के मध्य संबधों पर तेहरान की प्रतिक्रिया से रियाज़ की चितां है। सऊदी अरब को 2019 में सितंबर महीने की वह रात बहुत अच्छी तरह से याद है जब ईरान ने यमन और इराक़ मे अपने समर्थकों की मदद से सऊदी अरब के बेहद महत्वपूर्ण तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया था और उन्हें लंबी अवधि तक बंद कर दिया था। सऊदियो को इसी तरह यह भी याद है कि अमरीका व इस्राईल सहित कोई भी इस हमले का जवाब देने के लिए आगे नहीं बढ़ा। सऊदी अरब इस नतीजे पर पहुंच चुका है कि ईरान के खिलाफ युद्ध में वह अकेला है और दोनों के बीच शक्ति का संतुलन, रियाज़ के हित में नहीं है।

सऊदी अरब के असंमजस की एक और वजह बाइडन सरकार से उसका डर है। इस डर की भी कई वजहें हैं। पहली तो यह कि यह कहा जा रहा है कि बाइडन सरकार प्रतिबंधों को खत्म करके और परमाणु समझौते में वापसी करके तेहरान से निकट होने का प्रयास करेगी और अगर यह हुआ तो निश्चित रूप से ईरान की आर्थिक स्थिति, अच्छी होगी जिससे वह यमन के असांरुल्लाह को सऊदी अरब के खिलाफ अधिक मज़बूत कर लेगा। दूसरी बात यह कि बाइडन की सरकार, पहले की ट्रम्प की सरकार के विपरीत, सऊदी अरब को एक बार फिर मानवाधिकारों के ऐनक से देखने लगेगी और खाशुकजी की हत्या, फांसी की सज़ाओं और सऊदी अरब में विदेशी मज़दूरों के अधिकारों जैसे बहुत से मुद्दे उठाएगी। वाशिंग्टन की ओर से रियाज़ का समर्थन बेहद सीमित और तनावपूर्ण हो जाएगा और इस बात की बहुत कम संभावना है कि बाइडन सरकार, इस्राईल को सऊदी अरब के बहुत अधिक घनिष्ट संबंध बनाने की अनुमति दे। बाइडन सरकार इसी तरह से फिलिस्तीनी समस्या का समाधान करना चाहेगी इस लिए वह हर उस काम के सामने खड़ी हो जाएगी जिसमें फिलिस्तीनियों की मांगों की अनदेखी की गयी होगी। बल्कि यह भी संभव है कि अमरीकी सरकार, सन 2002 में सऊदी अरब द्वारा पेश की गयी शांति योजना की तरफ वापसी की बात करने लगें।
इस्राईल के साथ संबंध बनाने के लिए सऊदी अरब के असंमजस की तीसरी वजह, सऊदी अरब के अपने हालात हैं। पश्चिम और इस्राईल, सऊदी अरब को आम तौर पर क्राउन प्रिंस बिन सलमान के बयानों और उनके द्वारा चलाए गये सुधार कार्यक्रमों के आइने में देखते हैं लेकिन सच्चाई बहुत अलग है। सऊदी अरब की भीतरी राजनीति में और भी कई प्रभावशाली खिलाड़ी हैं जिनकी अनदेखी कर दी जाती है।
सब से पहली चीज़ तो खुद क्राउन प्रिंस की पोज़ीशन है। सन 2017 में जब से वह क्राउन प्रिंस बने हैं, शाही परिवार के सदस्यों के आक्रोश का पात्र बन गय। जब उन्हें क्राउन प्रिंस बनाया गया तो उनकी आयु मात्र 32 साल थी और वह पहले वाले उत्तराधिकारियों की तुलना में काफी कम उम्र थे। सऊदी अरब के पारंपरिक समाज में किसी भी सरकारी पद के लिए आयु एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है। बड़े बड़ों को छोड़ कर एक युवा को बड़ा पद देना गैर कानूनी है। दूसरी समस्या, देश संचालन में बिन सलमान की अयोग्यता है। इस कमी की वजह से वह अपने से पहले वाले उत्तराधिकारियों की तुलना में जो, मंत्री, राजदूत, सैन्य कमांडर और बड़ी बड़ी कंपनियों के निदेशक रह चुके थे, काफी छोटे क़द के समझे जाते हैं।

सऊदी अरब में यह विचार आम है कि देश चलाने के लिए बिन सलमान से अधिक योग्य और दक्ष लोग मौजूद हैं। बिन सलमान के विरोधी रात दिन उनके खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं। नंवबर 2017 में पद संभालने के मात्र 6 महीनों बाद बिन सलमान ने अपने दसियों चचेरे भाईयों और शाही परिवार के कई अन्य सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें रियाज़ के एक होटल में बंद कर दिया। बिन सलमान ने उनकी रिहाई के लिए अरबों डॉलर वसूल किये और उनमें से दो की मौत भी हो गयी। आज शाही परिवार के इन लोगों ने न बिन सलमान को माफ किया है और न ही वह अपना अपमान भूल पाए हैं। सऊदी शाही परिवार के बहुत से सदस्य यमन की भयानक जंग और उसके परिणामों के लिए बिन सलमान को ज़िम्मेदार समझते हैं इसी तरह वह खाशुकजी की हत्या के बाद पूरी दुनिया में सऊदी अरब की जो फज़ीहत हुई है उसके लिए भी बिन सलमान को ही कटघरे में खड़ा करते हैं।
हालांकि सऊदी अरब में बहुत से युवा, महिलाओं के प्रति बिन सलमान के सुधार कार्यक्रमो का समर्थन करते हैं, लेकिन शाही परिवार में यह सुधार सब को पसंद नहीं है। इस लिए यह सौ फीसद पक्का नहीं है कि सऊदी अरब के अगले शासक वही होंगे। सरकारी संस्थाएं बिन सलमान को सऊदी अरब का अगला नरेश बता रही हैं लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस लिए इस्राईल के लिए बेहतर है कि चुपचाप बैठ कर यह देखे कि आगे होता क्या है ? यह जल्दबाज़ी में क़दम उठा कर नुकसान करने से बहुत बेहतर है। सऊदी अरब के पास इस्राईल के साथ संबंध बनाने की कोई राजनीतिक, सामाजिक, देशी विदेशी मज़बूत वजह नहीं है। सऊदी अरब इस्राईल के साथ एक बेहद मज़बूत वजह के बाद ही संबंध बनाएगा और फिलहाल इस तरह की कोई वजह नज़र नहीं आ रही है।